श्री नर्मदेश्वर महादेव मंदिर की दिव्य कथा

Shri Narmadeshwar Mahadev Mandir Trust

नर्मदा परिक्रमा से आरंभ हुई एक अद्भुत यात्रा

नितिन दादा की यात्रा शुरू हुई 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, ओंकारेश्वर मंदिर के आशीर्वाद के साथ। नर्मदा मैया के दक्षिण तट पर उनकी परिक्रमा शुरू हुई । रास्ते में अनेक तीर्थों, प्राचीन मंदिरों और संतों के आश्रमों से गुज़रते हुए वे आगे बढ़ते रहे। हर पड़ाव पर नए अनुभव मिलता गया और आत्मविश्वास बढ़ता गया।

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यात्रा की शुरुआत - ओंकारेश्वर मंदिर

नितिन दादा की यात्रा शुरू हुई 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, ओंकारेश्वर मंदिर के आशीर्वाद के साथ। नर्मदा मैया के दक्षिण तट पर उनकी परिक्रमा शुरू हुई । रास्ते में अनेक तीर्थों, प्राचीन मंदिरों और संतों के आश्रमों से गुज़रते हुए वे आगे बढ़ते रहे। हर पड़ाव पर नए अनुभव मिलता गया और आत्मविश्वास बढ़ता गया।

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बिमलेश्वर का विराम, यात्रा का उत्थान

बिमलेश्वर की शांत रात में ठहराव मिला, जहाँ नदी के बीच लहरों पर डोलती एक छोटी-सी नाव उनका इंतज़ार कर रही थी। अगली सुबह ठीक 4 बजे, वे विश्वास और धैर्य के सहारे उसी नाव पर सवार हुए। दक्षिण तट से उत्तर तट की ओर कदम बढे, जिसे देवों का मार्ग कहा गया है।

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अद्भुत वन यात्रा — भय, संघर्ष और ईश्वरीय संरक्षण

अमावस्या के दिन, लाखों भक्तों की भीड़ के बीच वे करनाली के कुबेर भंडारी मंदिर की ओर बढ़ रहे थे, तभी अपने साथियों से बिछड़ गए। सफर अचानक कठिन परीक्षा में बदल गया। रास्ता बंद मिला, और वापस लौटना मुमकिन न था। उन्होंने हिम्मत से चढान का सामना किया, लेकिन आगे घना जंगल था, जहाँ रेंगते हुए आगे बढ़ना पड़ रहा था। चोट, दर्द और थकान से भरे शरीर के साथ वे एक ऐसे जगह पर पहुँचे जहाँ आगे कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। उसी पल उन्होंने माँ नर्मदा को पुकारा - “आप मुझे यहां तक लाए हैं, मुझे विश्वास है की आप ही मुझे मंज़िल तक भी पहुचायेंगे।” और तभी, जैसे भगवन ने संकेत भेजा हो, एक युवती सामने शांत मुद्रा में बैठी दिखाई दी। उसने बस इतना कहा, “मैय्या साथ है।" और रास्ता दिखा दिया। कुछ ही मिनटों में वे जंगल से बाहर निकल आए और वापस अपने बिछड़े हुए साथियों के साथ मिल गए। यह उनका पहला अविस्मरणीय अनुभव था जिसने उन्हें अंदर तक बदल दिया।

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कुबेर भंडारी — तप, थकावट और चमत्कार

नितिन दादा रात तक कुबेर भंडारी मंदिर पहुँचे।पूजा और जप के उपरांत वे काफी थक चुके थे, मन भी भावनाओ से भर चूका था। नर्मदा नदी में डुबकी लगते ही उनकी सारी थकन मिट गयी, मन प्रफुल्लित हो गया। आश्रम में गुरु जी मिले, दादा ने उनसे 108 बार हनुमान चालीसा पाठ करने की इच्छा व्यक्त की। गुरु जी ने पाठ का महत्व समझाया। रात को लगभग 8 बजे से पाठ करना शुरू किये और उसी में पूरी तरह लीन हो गए। रात गहराती गयी, चारो ओर डरावना सन्नाटा छा गया, विभिन्न तरह की आवाज़े आने लगी, फिर भी वे रुके नहीं और सुबह 3 कब बजे पता ही नहीं  चला। जब वे कुटिया से बहार निकले, तो उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक और गहरी शांति थी, मानो उनके अंदर एक नई सी ऊर्जा भर गयी हो। 

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उत्तरवाहिनी में स्वयंभू शिवलिंग की प्राप्ति

यात्रा आगे बढ़ती रही और वे पहुंचे परिक्रमा के अत्यंत शुभ और दुर्लभ स्थल – उत्तरवाहिनी,  जहाँ से माँ नर्मदा उत्तर की ओर बहती हैं। यहीं, (डेट) सोमवार दोपहर 12 बजे, उन्हें कुछ चमकता हुआ आकर्षित करने लगा, जो आधा पानी में डूबा हुआ था। पास जाकर देखा तो वे आश्चर्यचकित रह गए। यह कुछ और नहीं बल्कि – एक स्वयंभू शिवलिंग !! 

नितिन दादा ने उसी क्षण अनुभव किया कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि महादेव का प्रतीक है। शिवलिंग इतना भारी था कि दो लोग भी मुश्किल से उठा पाते, परंतु जब कोई एक व्यक्ति इसे कंधे पर लेता, उसके शरीर में एक अद्भुत ऊर्जा उत्पन्न होने लगती, जैसे 108 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने का फल मिला हो, जो शिवलिंग उठाता उसमे हनुमान जी का बल आ जाता। 

दादा के जीवन को उस वक़्त एक नयी दिशा सी मिल गयी। यह सिर्फ एक संयोग ही नहीं, बल्कि एक संदेश था। नर्मदा परिक्रमा के प्रत्येक संघर्ष, प्रत्येक चमत्कार, प्रत्येक साक्षात्कार, मानो एक-एक करके भगवान शिव उन्हें इस ओर ले जा रहे थे।बस, यही से दादा के मन-मस्तिष्क में सनातन धर्म के प्रति समर्पण की भावना जागने लगी जिसका परिणाम यह है की उसी शिवलिंग की स्थापना आज श्री नर्मदेश्वर महादेव मंदिर, आढले बू, मावळ, पुणे में हो रही है।

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श्री नर्मदेश्वर महादेव मंदिर की

आधुनिक जीवन में भक्ति, ज्ञान और संस्कृति – इन तीनों को जीवन में स्थायी रूप से स्थापित करने की पावन भावना से “श्री नर्मदेश्वर महादेव मंदिर” का निर्माण हो रहा है।

इस मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश, श्री कार्तिकेय और श्री हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठा होगी। मंदिर की वास्तुकला, मूर्तियाँ, गर्भगृह, मंडप, सब कुछ पारंपरिक वैदिक सिद्धांतों और आध्यात्मिक ऊर्जा के अनुरूप निर्मित किया जा रहा है।

हमारी धरोहर, हमारा सपना! 

  • गोधाम ईको व्हिलेज में नर्मदेश्वर मंदिर का निर्माण केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक अद्वितीय आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में हमारी परंपराओं और मूल्यों का जतन करने का संकल्प है।
  • सनातन संस्कृति और अध्यात्म को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का माध्यम।
  • शिव श्रुष्टि के निर्माण द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज की जन्म से निर्वाण तक की गाथा दर्शायी जाएगी।
  • पूजा-पाठ, भजन, प्रवचन और कीर्तन से आस्था, सकारात्मक सोच और जीवन में संतुलन।
  • सोळा संस्कार , बारा बलुतेदार, अन्नदान, ज्योतिष, गोसेवा, सभी उत्सव और आध्यात्मिक अनुभव से परिपूर्ण स्थान।
  • प्रकृति व दिव्य ऊर्जा से जुड़ा स्थल, जो समाज को शांति और आनंद की राह दिखाए।